उत्तर प्रदेश

उन्नाव का दर्दनाक साया: कुत्ते की भौंकने की आवाज़ ने छीनी एक किशोर की सांसें

संगठनों ने भरी हुंकार कब तक चुप बैठेगी सरकार

उन्नाव, 22 अक्टूबर 2025: उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मदाऊ खेड़ा गांव में एक ऐसी घटना घटी है, जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया है। एक साधारण-सी बात—एक कुत्ते का भौंकना—एक किशोर की ज़िंदगी का अंत बन गई। 17 साल का ऋतिक, जो अपने गांव हिंदू खेड़ा से गुजर रहा था, महज एक विरोध के चलते अपमान की चरम सीमा तक पहुंच गया। आरोप है कि आरोपी ने उसे पैरों पर नाक रगड़वाई, और इस बेइज्जती ने उसके दिल में इतना जहर घोल दिया कि वह असली जहर पीने को मजबूर हो गया। आज सुबह हैलेट अस्पताल पहुंचते ही उसकी सांसें थम गईं।
घटना की शुरुआत 17 अक्टूबर को हुई। ऋतिक अपने दैनिक सफर पर था। तभी विशंभर नामक व्यक्ति के घर के बाहर बंधा पालतू कुत्ता भौंकने लगा। किशोर ने शायद हल्के से आपत्ति जताई—क्या पता, डर गया हो या चिढ़ गया हो। लेकिन यह छोटी-सी बात अगले दिन तूफान बनकर लौट आई। 18 अक्टूबर को विशंभर अपने दोस्तों अमन और अभिषेक को साथ लेकर ऋतिक के घर धमक पड़ा। वहां कथित तौर पर किशोर को घसीटा गया, गालियां दी गईं, और अपमान की इंतहा तब हुई जब उसे जबरन घुटनों पर बिठाकर पैर छूने पड़े। गवाहों के मुताबिक, यह नाक रगड़वाने जैसा कृत्य इतना शर्मनाक था कि आसपास के लोग भी चुपचाप तमाशा देखते रहे। कोई नहीं बोला, कोई नहीं रोका।
ऋतिक चुपचाप सह गया। लेकिन उसके मन का दर्द बाहर न आने पाया। परिवार बताता है कि वह सुबह-सुबह उठा, चाय पी, और फिर घर के पास रखे कीटनाशक की बोतल उठा ली। 19 अक्टूबर दोपहर को जब परिवार ने उसे बेहोश पाया, तो हड़कंप मच गया। पहले उन्नाव जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां हालत बिगड़ती चली गई। फिर प्राइवेट नर्सिंग होम, लेकिन जहर शरीर में फैल चुका था। आखिरकार, लखनऊ के हैलेट अस्पताल पहुंचे, लेकिन रास्ते में ही ऋतिक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। डॉक्टरों ने बताया कि कीटनाशक का असर इतना घातक था कि इलाज का कोई मौका ही न मिला।
परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। ऋतिक के चाचा श्रवण ने बताया, “वह एक होनहार लड़का था। पढ़ाई करता, घर में मदद करता। कल्पना कीजिए, एक कुत्ते की भौंकने पर ऐसा अपमान! हमारा समाज कहां जा रहा है?” मां का रोना देखकर गांव वाले भी आंसू बहा रहे हैं। पिता, जो मजदूरी करते हैं, सदमे में बोल ही नहीं पा रहे। गांव में शोक की लहर दौड़ गई है। लोग फुसफुसा रहे हैं—क्या अपमान इतना सस्ता हो गया है?
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। श्रवण की शिकायत पर कोतवाली थाने में मुख्य आरोपी विशंभर और उसके साथियों अमन व अभिषेक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मुकदमा दर्ज हो गया। क्षेत्राधिकारी नगर दीपक यादव ने कहा, “मामला बेहद संवेदनशील है। हम गहन जांच कर रहे हैं। आरोपी फरार हैं, लेकिन जल्द गिरफ्तार होंगे। शव का पोस्टमॉर्टम हो चुका है, जिसमें जहर की पुष्टि हुई है।” पुलिस टीम गांव में छापेमारी कर रही है, और गवाहों के बयान दर्ज हो रहे हैं। एसपी उन्नाव ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए विशेष टीम गठित करने के आदेश दिए हैं।
यह घटना सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज का आईना है। जहां एक तरफ डिजिटल दुनिया में सम्मान की दुहाई दी जाती है, वहीं गांवों में अपमान अभी भी मौत का पैगाम बन जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरावस्था में मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना घातक है। अपमान का घाव गहरा होता है, जो जहर से भी ज्यादा मारक साबित होता है।” उन्नाव जिले में पिछले साल 15 से ज्यादा किशोरों ने आत्महत्या की, जिनमें से आधे मानसिक प्रताड़ना से जुड़े थे। क्या यह आंकड़े झकझोरने को काफी नहीं?
सवाल यह है—क्या हमारा समाज इतना संवेदनहीन हो गया है कि एक मासूम का विरोध जानलेवा बन जाए? विशंभर जैसे लोग क्यों नहीं समझते कि उनकी हरकतें किसी की पूरी जिंदगी उजाड़ सकती हैं? सरकार को सख्त कानून बनाने होंगे, लेकिन पहले समाज को खुद सुधारना होगा। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा, गांवों में जागरूकता अभियान—ये कदम उठाने का वक्त आ गया है। ऋतिक की मौत व्यर्थ न जाए। उसके नाम पर एक नई शुरुआत हो, जहां अपमान की जगह सम्मान मिले, और भौंकने वाली आवाज़ सिर्फ कुत्ते की रहे, इंसान की न हो।

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