उत्तर प्रदेश

UGC Controversy में BJP के अपने ही नेता आपस में भिड़े, सियासी ड्रामा तेज

UGC Controversy: राजनीति अक्सर अपने अजीब और चौंकाने वाले रंग दिखाती है। आज देश के हर कोने में, उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर एक गहमागहमी छाई हुई है। खास बात यह है कि भाजपा के कई नेता, जो अपनी ही सरकार का हिस्सा हैं, इस नियम का विरोध कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों और केंद्र सरकार में भी ऐसा हो रहा है। इस पूरे विवाद में कई दिलचस्प पहलू सामने आए हैं, जो राजनीति की पेचीदगियों को दिखाते हैं।

भाजपा नेताओं के अंदर विरोध के स्वर

UGC नियमों को मंजूरी देने वाली समिति के सदस्य भाजपा सांसद करन भूषण सिंह हैं, जो पूर्व कैसरगंज सांसद और भाजपा नेता ब्रज भूषण शरण सिंह के बेटे हैं। करन भूषण के अलावा ग़ोसी से सांसद राजीव राय और संभल से सांसद ज़ियाउर रहमान भी इस समिति में शामिल थे। लेकिन सबसे रोचक बात यह है कि ब्रज भूषण शरण सिंह के पुत्रों में से एक करन भूषण इस समिति का हिस्सा थे जबकि उनके भाई और गोंडा विधायक प्रतीक भूषण सिंह इस नियम का विरोध कर रहे हैं। प्रतीक ने 26 जनवरी की शाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि इतिहास के दोहरे मानकों की अब गहन जांच होनी चाहिए, जहां विदेशी आक्रमणकारियों और औपनिवेशिक शक्तियों के जघन्य अत्याचारों को ‘भूतकाल की बात’ माना जाता है जबकि समाज के एक हिस्से को निरंतर ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में निशाना बनाया जाता है।

समाजवादी पार्टी की उलझन और अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया

UGC विवाद में सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी (सपा) भी उलझन में नजर आ रही है। सपा के सांसद राजीव राय, जो अब तक चुप्पी साधे हुए थे, उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि कानून समिति द्वारा नहीं बनते बल्कि सरकार बनाती है और संसद में बहुमत से पास होते हैं। वहीं, सपा के राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने नियमों के समर्थन में अपनी राय व्यक्त की है, पर उनकी पार्टी की स्पष्ट स्थिति अभी तक सामने नहीं आई है। संभल से सांसद ज़ियाउर रहमान, जो समिति के सदस्य भी हैं, ने फेसबुक पर लिखा कि उन्होंने UGC के संबंध में कोई विशेष बयान नहीं दिया है। उनका कहना है कि अगर सरकार कोई ऐसा विधेयक लाए जो देश के विकास और जनहित में हो तो उसका समर्थन किया जाएगा, और अगर ऐसा विधेयक लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ होगा तो लोकतांत्रिक तरीके से उसका विरोध भी किया जाएगा। उनका स्पष्ट संदेश है कि समर्थन और विरोध दोनों जनहित के लिए हैं।

कांग्रेस की दुविधा और भाजपा की मुश्किलें

इस विवाद में कांग्रेस पार्टी भी फंसी हुई है। कांग्रेस न तो बिल का खुलेआम समर्थन कर पा रही है और न ही उसका विरोध। इसका सबसे बड़ा कारण है कि इस समिति के अध्यक्ष राज्यसभा सांसद और पूर्व मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हैं, जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। वहीं भाजपा को भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समिति के कई वरिष्ठ और नए सांसद जैसे हेमंग जोशी, संभित पात्रा, बांसुरी स्वराज और रवि शंकर प्रसाद अभी तक इस पूरे मुद्दे पर चुप्पी बनाए हुए हैं। इस तरह UGC के नए नियम न सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में बल्कि राजनीति के गलियारों में भी उथल-पुथल मचा रहे हैं। नेताओं के अंदर मतभेद और राजनीतिक समीकरण इस विवाद को और पेचीदा बना रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहराने की संभावना है।

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